What is Indian Constitutional Framework : Preamble in Hindi ?

भारतीय संविधान की उद्देशिका (Indian Constitutional Framework : Preamble)

  1. प्रारंभिक उद्देश्य:
    • संविधान के निर्माण से समाज की समानता और न्याय को सुनिश्चित करना।
    • विभिन्न समाज वर्गों, जातियों और धर्मों के लोगों के अधिकारों की सुरक्षा देना।
  2. आस्ट्रेलियाई प्रभाव:
    • संविधान की उद्देशिका में आस्ट्रेलियाई संविधान के निर्माण के मूल्यों और विचारधारा का प्रभाव महसूस होता है।
    • इसका उद्देश्य भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सुरक्षित करना, समाजिक न्याय स्थापित करना और राष्ट्रीय एकता तथा विकास को प्रोत्साहित करना है।
  3. संविधान का सार:
    • उद्देशिका संविधान की मुख्य पहचान है, जो इसके लक्ष्यों और मूल सिद्धांतों को प्रकट करती है।
    • यह संविधान के विचारधारा और दर्शन को भी उजागर करती है, जो राष्ट्र की पहचान और दिशा निर्देशित करते हैं।

 

 

Indian Constitutional Framework : Preamble
Indian Constitutional Framework : Preamble

 

 

केहर सिंह बनाम भारत संघ के वाद पर विचार

  1. संविधान सभा का प्रतिनिधित्व:
    • केहर सिंह ने दावा किया कि संविधान सभा भारतीय जनता का सीधा प्रतिनिधित्व नहीं करती थी।
  2. संविधान विधि की अनुकृपा:
    • इस वाद में संविधान सभा को विशेष अनुकृपा प्राप्त नहीं होने का दावा किया गया।
  3. न्यायालय का निर्णय:
    • न्यायालय ने संविधान को सर्वोपरि मानकर संविधान सभा के प्रतिनिधित्व को खारिज किया।
    • कोई प्रश्न संविधान के सर्वोपरि मानने पर उठाया नहीं जा सकता है।
  4. संविधान का आदर्श रूप:
    • संविधान को आदर्श रूप में माना गया है, जिस पर कोई प्रश्न नहीं उठाया जा सकता।

 

भारतीय संविधान के प्रस्तावना प्रस्ताव

  • हम, भारत के लोग:
    • भारत को संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने का संकल्प लेते हैं।
  • नागरिकों के अधिकार:
    • सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय के अधिकार प्राप्त करने का संकल्प।
    • विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने का प्रतिबद्धता।
    • प्रतिष्ठा और अवसर में समता की गारंटी।
  • व्यक्तिगत और राष्ट्रिय मूल्य:
    • व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता को सुनिश्चित करने का संकल्प।
    • बन्धुता बढ़ाने का प्रतिबद्धता।
  • संविधान के प्रति प्रतिबद्धता:
    • दृढ़ संकल्प से अपनी संविधानसभा में दिनांक २६ नवम्बर १९४९ ई. (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत दो हजार छह विक्रमी) को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित किया जाता है।

 

 

उद्देशिका की प्रकृति

  1. संविधान का महत्व:
    • यह संविधान का महत्वपूर्ण अंग नहीं है।
    • राज्य के तीनों अंगों को शक्ति देने में संविधान इसका कोई योगदान नहीं देता।
    • शक्तियां संविधान के अन्य अनुच्छेदों से प्राप्त होती हैं, और इससे उनकी शक्ति पर कोई रोक नहीं है।
  2. संविधानिक अनुच्छेदों की प्राथमिकता:
    • यह उद्देशिका संविधान के किसी अनुच्छेद को विशेष बल नहीं देता है।
    • अगर किसी अनुच्छेद में संघर्ष होता है, तो उसे प्राथमिकता मिलेगी।
  3. न्यायालय में प्रयोग:
    • न्यायालय में इस उद्देशिका पर कोई वाद नहीं लाया जा सकता।
    • न्यायालय इसे लागू नहीं कर सकता।
  4. उद्देशिका की प्रकृति का विवेचन:
    • कई बार इसे मात्र शोभात्मक आभूषण कहा गया है।
    • सर्वोच्च न्यायालय इसे सीमित भूमिका मानता है, और इसका प्रयोग संविधान में अस्पष्टता को दूर करने के लिए किया जा सकता है।

 

उद्देशिका के उद्देश्य

  1. संविधान का जनता के प्रति संबंध:
    • उद्देशिका स्पष्ट करती है कि संविधान जनता के लिए बना है और जनता ही अंतिम सम्प्रभु है।
  2. लोगों के लक्ष्य और आकांक्षाओं का प्रकटीकरण:
    • उद्देशिका लोगों के लक्ष्य और आकांक्षाओं को प्रकट करती है।
  3. संविधान में अस्पष्टता के समाधान:
    • इसका प्रयोग संविधान में अस्पष्टता या असमंजस को दूर करने में किया जा सकता है।
  4. संविधान की पारिति तिथि:
    • यह जानकारी प्राप्त की जा सकती है कि संविधान किस तारीख को बना और पारित हुआ था।

भारत का राष्ट्रीय चरित्र:

  • भारत एक स्वतंत्र, संप्रभु गणराज्य है।

 

 

उद्देशिका का संविधान में स्थिति पर दो प्रमुख मत:

1. परम्परागत मत:

  • उद्देशिका का स्थान:
    • यह संविधान का भाग नहीं मानता है।
    • अगर इसे विलोपित किया जाए, तो भी संविधान अपनी विशेष स्थिति बनाए रख सकता है।
  • प्रस्तावना की भूमिका:
    • सर्वोच्च न्यायालय ने इस मत को बेरुबारी यूनियन वाद 1960 में प्रकट किया।
    • संविधान की अस्पष्टता में प्रस्तावना विविध निर्वाचन में सहायक होती है, इसलिए “विधायिका” प्रस्तावना में संशोधन नहीं किया जा सकता।

2. नवीन मत:

  • उद्देशिका का स्थान:
    • इसे संविधान का भाग मानता है।
    • सर्वोच्च न्यायालय ने इसे संविधान का एक भाग बताया है केशवानन्द भारती बनाम केरल राज्य 1973 में दिए निर्णय में।
  • संविधान संशोधन:
    • संविधान के इसे एक भाग मानने की वजह से संसद ने 42वें संविधान संशोधन से इसे संशोधित किया था।
    • समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और अखंडता शब्द संविधान में जोड़े गए थे।
  • वर्तमान में की मान्यता:
    • वर्तमान में नवीन मत ही मान्य है।

 

 

उद्देशिका के आदर्श

  • उद्देशिका के आदर्शों की प्राप्ति:
    • इन आदर्शों को कम या अधिक मात्रा में प्राप्त (अग्रलिखित) किया गया है।
  • अपेक्षाएं (लक्ष्य):
    • स्वतंत्रता: जनता को आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक स्वतंत्रता प्राप्त करना है।
    • न्याय: समाज में समान न्याय के साथ जीना है।
    • समानता: समाज में सभी लोगों के बीच समानता का स्थान हो।
  • लक्ष्य:
    • जनतांत्रिक और समाजवादी समाज का निर्माण करना है।
  • उपाय (आदर्श):
    • जनतांत्रिक: जनता को सशक्त बनाकर निर्णय लेने में सहायक होना है।
    • समाजवादी: समाज में समानता और न्याय को स्थापित करने के लिए आवश्यक उपाय लेना है।

 

 

 

उद्देशिका के शब्दों का विश्लेषण 📜

  • सम्प्रभु 🏛️
    • राज्य की सर्वोपरि राजनैतिक शक्ति।
    • राजनैतिक सीमाओं के भीतर इसकी सत्ता सर्वोपरि है।
    • बाहरी शक्ति की प्रभुता स्वीकार नहीं करती।
  • समाजवादी 🌐
    • लोक तांत्रिक भारतीय समाजवाद का अनिवार्य तत्व।
    • समाजवादी लक्ष्यों की प्राप्ति लोक तांत्रिक माध्यमों से।
    • भारत को जनकल्याणकारी राज्य के रूप में स्थापित करता है।
  • पंथनिरपेक्षता 🕉️
    • लौकिकता को आध्यात्मिक्ता पर वरीयता।
    • धर्म पर आधारित भेदों का सम्मान।
    • विविध धर्मों के मध्य सहिष्णुता तथा सहयोग की प्रोत्साहन।
    • धर्मनिरपेक्ष राज्य, जो नागरिकों को धर्म पालन का अधिकार देता है।
  • जनतंत्र 🗳️
    • भारत में बहुदलीय लोकतंत्र।
    • अनुच्छेद 19 और अनुच्छेद 326 जनतंत्र से संबंधित है।
  • गणतंत्र 👑
    • राजप्रमुख निर्वाचित होगा, न कि वंशानुगत।

इस प्रकार उद्देशिका के शब्द भारतीय संविधान में मूल्यांकन और अर्थ बोध को स्पष्ट करते हैं।

 

अपेक्षाएँ 🎯

  • न्याय ⚖️
    • सामाजिक, आर्थिक, और राजनैतिक न्याय के प्रकारों का प्रावधान।
    • भारतीय नागरिकों को न्याय प्राप्ति की गारंटी।
    • 1 व्यक्ति 1 वोट के माध्यम से राजनैतिक न्याय की प्राप्ति।
    • सामाजिक न्याय के लिए अस्पृश्यता और उपाधि का उन्मूलन।
    • आर्थिक न्याय के लिए राज्य द्वारा नीति निर्देशक तत्वॉ का प्रावधान।
  • स्वतंत्रता 🕊️
    • नागरिक पर बाध्यकारी और बाहरी प्रतिबंधों का अभाव।
    • नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन निषेध।
    • नागरिक स्वतंत्रता अनुच्छेद 19 में वर्णित है।
    • धार्मिक स्वतंत्रता अनु 25-28 में वर्णित है।
  • समानता ⚖️
    • स्तर और अवसरों में समानता की स्थापना।
    • अनुच्छेद 14 से 18 में समानता का प्रावधान।
  • बंधुत्व ❤️
    • भारतीय नागरिकों के बीच बंधुत्व की भावना का स्थापना।
    • एकता की स्थापना के लिए बंधुत्व की महत्वपूर्ण भूमिका।

 

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