Chola Empire चोल साम्राज्य

Table of Contents

a👑 चोल राजवंश के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी:

  • स्थापना: चोल राजवंश (Chola Empire चोल साम्राज्य)  की स्थापना लगभग 9 वीं शताब्दी में हुई।
  • क्षेत्र: चोल राजवंश दक्षिण भारत के मुख्य भू-भागों में स्थित था।
  • शक्तिशाली साम्राज्य: चोल राजवंश ने 9 वीं से 13 वीं शताब्दी तक एक अत्यंत शक्तिशाली हिन्दू साम्राज्य का निर्माण किया।
  • समृद्धि का काल: इसके शासकों के काल में कला, साहित्य, धर्म, और व्यापार में समृद्धि का काल था।
  • कावेरी नदी के पास: चोल सम्राज्य की राजधानी तंजावुर कावेरी नदी के किनारे स्थित थी।
  • महान राजा: राजराज चोल और उनका पुत्र राजेंद्र चोल चोल सम्राज्य के महान राजा थे।
  • कावेरी नदी परियोजनाएं: चोल राजाओं ने कावेरी नदी के सिंचाई परियोजनाओं को बढ़ावा दिया।
  • कला और संस्कृति का प्रशासन: चोल राजा ने कला, संस्कृति, और धर्म के क्षेत्र में प्रशासन को प्रोत्साहित किया।
  • हंसवाहन तथा चोल संघर्ष: इतिहास में हंसवाहन और चोल संघर्ष एक महत्वपूर्ण अध्याय था। 🏰🌊📜

 

Chola Empire चोल साम्राज्य
Chola Empire चोल साम्राज्य

 

🔍 ‘चोल’ शब्द की व्युत्पत्ति:

  • कर्नल जेरिनो की धारणा: कर्नल जेरिनो ने ‘चोल’ शब्द को संस्कृत “काल” एवं “कोल” से संबद्ध करते हुए इसे दक्षिण भारत के कृष्णवर्ण आर्य समुदाय का सूचक माना है।
  • चोर और चोलम्: कुछ लोग ‘चोल’ शब्द को संस्कृत “चोर” तथा तमिल “चोलम्” से भी संबद्ध किया है, परंतु इनमें से कोई मत ठीक नहीं है।
  • प्रचलित नामों में शेंबियन्: चोलों के अनेक प्रचलित नामों में ‘शेंबियन्’ भी है, जिसके आधार पर उन्हें शिबि से उद्भूत सिद्ध किया जाता है।
  • संगमयुगीन मणिमेक्लै: संगमयुगीन मणिमेक्लै में चोलों को सूर्यवंशी कहा गया है।
  • करिकाल राजवंश: 12वीं सदी के अनेक स्थानीय राजवंश अपने को करिकाल से उद्भूत कश्यप गोत्रीय बताते हैं।

इन विभिन्न धारणाओं के आधार पर ‘चोल’ शब्द की व्युत्पत्ति एक विषय पर विचार करने के लिए उत्प्रेरित करती है। 📚🔍🌞

🏛️ चोलों के प्राचीन उल्लेख:

  • कात्यायन और अशोक के अभिलेखों में उल्लेख: कात्यायन ने चोडों का उल्लेख किया। अशोक के अभिलेखों में भी चोलों का उल्लेख मिलता है।
  • संगमयुग में प्रभाव: चोलों का प्राचीन इतिहास संगमयुग में प्रभावित होता है, जब उन्होंने दक्षिण भारतीय इतिहास को प्रभावित किया।
  • करिकाल चोल: संगमकाल के महत्वपूर्ण चोल सम्राटों में करिकाल अत्यधिक प्रसिद्ध हुए, लेकिन संगमयुग के बाद का चोल इतिहास अज्ञात है।
  • चोल-वंश-परंपरा: चोल-वंश-परंपरा अज्ञात काल में भी समाप्त नहीं हुई, क्योंकि रेनंडु प्रदेश में वे अन्य राजवंशों के अधीन शासन करते रहे। 🌄📜

🌟 नवीं सदी के मध्य से चोलों का पुनरुत्थान:

  • विजयालय का संस्थापक: चोल वंश (Chola Empire चोल साम्राज्य) का पुनरुत्थान विजयालय (850-870-71 ई.) के अधीन उरैयुर प्रदेश के शासक विजयालय द्वारा हुआ।
  • विजयालय के शासक: विजयालय के पश्चात्, आदित्य प्रथम (871-907) और परांतक प्रथम (907-955) ने शासन किया।
  • परांतक प्रथम की शक्ति: परांतक प्रथम ने अपनी शक्ति से पांड्य-सिंहल नरेशों को पराजित किया और अनेक राजवंशों को भी शासन किया।
  • सिंहल पर आक्रमण: उसने लंकापति उदय (945-953) के समय सिंहल पर आक्रमण किया, हालांकि यह असफल रहा।
  • चोल साम्राज्य की नींव हिल गई: परांतक प्रथम की पराजय के बाद, चोल साम्राज्य की नींव हिल गई, लेकिन उसके उत्तराधिकारी राजाओं ने शासन को जारी रखा। 🏰👑

 

🕍 राजराज चोल की प्रतिमा तंजावुर के बृहदेश्वर मंदिर में:

  • राजराज चोल ने तंजावुर के बृहदेश्वर मंदिर में अपनी प्रतिमा का निर्माण करवाया।
  • यह प्रतिमा मंदिर की विशालता और शैली के लिए प्रसिद्ध है।

🚀 राजराज प्रथम की विजयें:

  • राजराज प्रथम ने पश्चिमी गंगों को पराजित कर उनका प्रदेश छीन लिया।
  • उन्होंने पश्चिमी चालुक्यों से युद्ध किया और दक्षिण में सफलता प्राप्त की।
  • केरल नरेश को पराजित कर मदुरा और कुर्ग को अपने अधीन किया।
  • राजराज ने सिंहल पर आक्रमण कर उसके उत्तरी प्रदेशों को अपने राज्य में शामिल किया।

🏰 चोल वंश(Chola Empire चोल साम्राज्य) की प्रसिद्धि:

  • राजराज प्रथम के योगदान से चोल वंश की प्रसिद्धि महान योद्धाओं और विजयों के बारे में बढ़ी।

🔱 राजराज की विजयें:

  • राजराज ने पूर्वी चालुक्यों पर आक्रमण किया और वेंगी को जीत लिया।
  • उन्होंने पूर्वी चालुक्य सिंहासन पर शक्तिवर्मन् को प्रतिष्ठित किया और अपनी पुत्री कुंदवा का विवाह उनके भ्राता विमलादित्य से कराया।
  • राजराज ने कलिंग के गंग राजा के भी विरुद्ध आक्रमण किया और उन्हें भी पराजित किया।

👑 राजेंद्र प्रथम की विजयें:

  • राजेंद्र प्रथम ने चेर, पांड्य, और सिंहल को जीता और उन्हें अपने राज्य में शामिल किया।
  • उन्होंने पश्चिमी चालुक्यों के साथ कई युद्ध लड़े और उन्हें पराजित किया।
  • राजेंद्र ने पूर्वी समुद्रतट से कलिंग, उड़ीसा, और दक्षिण कोशल के राजाओं को पराजित किया।
  • उन्होंने पश्चिम और दक्षिण बंगाल के छोटे राजाओं को भी हराया।
  • राजेंद्र का उद्दीश्य गंगा नदी का जल प्राप्त करना था, जिसमें उन्हें सफलता मिली।
  • उनके अभियानों से चोल साम्राज्य की सीमाओं पर कोई असर नहीं पड़ा।

🌊 राजेंद्र का आक्रमण:

  • राजेंद्र ने मलयद्वीप, जावा और सुमात्रा के शैलेंद्र शासन के खिलाफ आक्रमण किया।
  • यह आक्रमण पूर्ण रूप से नौसैनिक था।
  • शैलेंद्र सम्राटों का राजराज से मैत्रीपूर्ण व्यवहार था, लेकिन राजेंद्र के साथ उनकी शत्रुता का कारण अज्ञात है।
  • राजेंद्र ने इसमें सफलता प्राप्त की।
  • राजराज की भाँति, राजेंद्र ने भी एक राजदूत को चीन भेजा। 🚢

राजाधिराज प्रथम (1018-1054):

  • राजेंद्र का उत्तराधिकारी था (Chola Empire चोल साम्राज्य)।
  • उसका अधिकांश समय विद्रोहों के शमन में लगा।
  • अनेक छोटे राज्यों और चेर, पांड्य, सिंहल के विद्रोहों का दमन किया।
  • चालुक्य सोमेश्वर से हुए कोप्पम् के युद्ध में उसकी मृत्यु हुई।

👑 राजेंद्र द्वितीय (1052-1064):

  • उनकी विजय चालुक्यों के विरुद्ध हुई।
  • दीर्घकालिक युद्ध के बाद, प्राय: संपूर्ण चोल साम्राज्य पर पूर्ववत् शासन किया।

👑 वीर राजेंद्र (1063-1069):

  • अनेक युद्धों में विजय प्राप्त की।
  • प्राय: संपूर्ण चोल साम्राज्य पर पूर्ववत् शासन किया।

👑 अधिराजेंद्र (1067-1070):

  • वीर राजेंद्र का उत्तराधिकारी था।
  • कुलोत्तुंग प्रथम ने उससे चोल राज्यश्री छीन ली। 🏰

 

👑 कुलोत्तुंग प्रथम (1070-1120)

  • पूर्वी चालुक्य सम्राट् राजराज का पुत्र था।
  • माँ और मातामही दोनों राजेंद्र (प्रथम) चोल और राजराज प्रथम की पुत्रियाँ थीं।
  • अपनी स्त्री से विवाहित था जो राजेंद्र द्वितीय की पुत्री थी।
  • समस्त विद्रोहों का दमन करके अपनी स्थिति सुदृढ़ की।
  • अधिराजेंद्र और अपने पक्ष से हुए समस्त विद्रोहों का दमन किया।
  • विक्रमादित्य के आक्रमणों और विद्रोहों का सामना किया।
  • अपने राज्य में कुलोत्तुंग ने सिंहल को समेट लिया।
  • उसने सिंहल के अतिरिक्त प्राय: संपूर्ण चोल साम्राज्य और दक्षिणी कलिंग प्रदेश पर शासन किया।
  • चीन को एक राजदूत भेजा। 🏰

👑 विक्रम चोल (1118-1133):

  • कुलोत्तुंग का उत्तराधिकारी था।
  • वेंगी चोलों को छीन लिया।
  • होयसलों ने चोलों को कावेरी के पार भगा दिया और मैसूर प्रदेश को अधिकृत किया।
  • उनका शासनकाल 1118 से 1133 तक था। 🏰

 

👑 चोल इतिहास के महत्वपूर्ण घटनाक्रम:

 

चोल वंश के पश्चात सौ वर्ष का इतिहास:

  1. विक्रम चोल (1133-1150): उनके समय में चोल साम्राज्य का शासन था।
  2. कुलोत्तुंग द्वितीय (1133-1150): उन्होंने भी चोल साम्राज्य का शासन किया।
  3. राजराज द्वितीय (1146-1173): उनका भी चोल साम्राज्य पर शासन था।
  4. राजाधिराज द्वितीय (1163-1179): चौथे चोल राजा के रूप में उन्होंने शासन किया।
  5. कुलोत्तुंग तृतीय (1178-1218): चोल साम्राज्य के अंतिम कुलोत्तुंग राजा थे।
  6. राजराज तृतीय (1216-1246): उन्हें पांड्यों ने पराजित किया और उनकी राजधानी छीन ली।
  7. होयसलों का सहारा: चोल सम्राट् अपने आक्रामकों और विद्रोहियों के विरुद्ध होयसलों से सहायता लेते थे।
  8. कोप्पेरुंजिग का आक्रमण: राजराज को एकबार पांड्यों से पराजित होते हुए कोप्पेरुंजिग ने आक्रमण किया और उन्हें बंदी बना लिया। 🏰

 

👑राजेंद्र तृतीय के शासनकाल की महत्वपूर्ण घटनाएं:

  • 1246-1279: राजेंद्र तृतीय का शासनकाल।
  • पांड्य और गंडगोपाल तिक्क के साथ संघर्ष: राजेंद्र को पांड्यों के खिलाफ आंशिक सफलता मिली, लेकिन गंडगोपाल तिक्क की नाममात्र की अधीनता में राज्य का शासन किया।
  • गणपति काकतीय के आक्रमण: कांची पर आक्रमण के बाद, राजेंद्र को उसकी अधीनता स्वीकार करनी पड़ी।
  • जटावर्मन सुंदर पांड्य का आक्रमण: उत्तरी क्षेत्रों में हुए आक्रमण में चोल सम्राज्य को पांड्यों द्वारा पराजित किया गया।
  • चोल सम्राज्य का अंत: 1310 में मलिक काफूर के आक्रमण के बाद, चोल सम्राज्य का अंत हुआ।
  • चोल सम्राटों का शासन का धार्मिक उत्सव: साम्राज्य का आरंभ यौवराज्याभिषेक से माना जाता था। 🏰

 

चोल का शासन व्यवस्था 

🏛️ चोल शासन की संगठना:

  1. राजा का प्रभाव: राजा मंत्रियों और राज्याधिकारियों की सलाह से शासन करता था।
  2. मंडलों में विभाजन: राज्य को कई मंडलों में विभाजित किया गया था, जो मंडल कोट्टम् या बलनाडुओं में बाँटे गए थे।
  3. प्रशासनिक इकाइयाँ: नाडु (जिला), कुर्रम् (ग्रामसमूह), और ग्रामम् इनकी प्रमुख प्रशासनिक इकाइयाँ थीं।
  4. जनसभाएँ: चोल ग्रामसभाएँ “उर” या “सभा” कही जाती थीं, जिनके सदस्य ग्रामनिवासी होते थे।
  5. कार्यकारिणी परिषद्: सभा की कार्यकारिणी परिषद् (आडुगणम्) का चुनाव सदस्यों के बीच होता था।
  6. उपसमितियाँ: उत्तरमेरूर ग्रामशासन सभा की पाँच उपसमितियाँ होती थीं।
  7. स्वतंत्र ग्रामसभाएँ: ग्रामसभाएँ अपने शासन के लिए स्वतंत्र थीं, और सम्राटादि का कार्यकाल केवल एक वर्ष तक होता था। 🌟

 

🏛️ महत्वपूर्ण भवन निर्माता:

  1. सिंचाई की व्यवस्था: चोल शासकों ने सिंचाई की व्यवस्था को बढ़ावा दिया और कृषि को प्रोत्साहित किया।
  2. राजमार्गों के निर्माण: वे राजमार्गों के निर्माण में भी सक्रिय रहे।
  3. मंदिर निर्माण: चोल शासकों ने नगरों में विशाल मंदिरों का निर्माण करवाया, जैसे तंजौर में बने बृहदेश्वर मंदिर।
  4. बृहदेश्वर मंदिर: यह प्राचीन भारतीय मंदिरों में सबसे ऊँचा एवं बड़ा मंदिर है।
  5. मूर्तिकला का विकास: चोल राज्यकाल में मूर्तिकला का विकास हुआ, और पाषाण एवं धातुमूर्तियों में सजीवता और कलात्मकता आई। 🗿🎨

 

📚 साहित्यकारों का योगदान:

  1. जयंगोंडार: उन्होंने “कलिगंत्तुपर्णि” नामक ग्रंथ लिखा, जो चोल शासकों की विजयों को महाकाव्यात्मक रूप में वर्णित करता है।
  2. तिरुत्तक्कदेव: उनके द्वारा रचित “जीवक चिंतामणि” तमिल महाकाव्य का महत्वपूर्ण काव्य है, जो काव्यात्मक एवं धार्मिक विषयों पर आधारित है।
  3. कंबन: उन्होंने तमिल “रामायण” की रचना की, जो इस काल का महत्वपूर्ण काव्य है।
  4. ग्रंथ रचना: इस काल में व्याकरण, कोष, काव्यशास्त्र, छंद आदि विषयों पर भी महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना हुई। 📖✍️

 

चोल साम्राज्य की सांस्कृतिक स्थिति 

👑 राजशाही का गौरव:

  1. सम्राट के आश्रय में भव्य राजभवन का निर्माण हुआ, जहाँ उत्सव और अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता था।
  2. युवराज को शासनप्रबंध में संलग्न किया जाता था, और उन्हें सम्राट की सहायता के लिए तैयार किया गया था।
  3. राजा की मौखिक आज्ञा का पालन करने के लिए ‘उडनकूट्टम्’ नामक एक विशेष दल था।
  4. चोल साम्राज्य में नौकरशाही की सुसंगठित प्रणाली थी, जिसमें उच्च और निम्न वर्ग के अधिकारी शामिल थे।

🏛️ शासन प्रणाली:

  1. राज्य वलनाडु और मंडलम में विभाजित था, और नाडु और कूर्रम में उनके प्रशासनिक संगठन थे।
  2. भूमि को करदायी और करमुक्त भूमि में विभाजित किया गया था, और कर का उत्तरदायित्व ग्राम के प्रत्येक निवासी को था।
  3. सेना को विभिन्न सैन्य दलों में बाँटा गया था, जिनमें कई विशिष्ट नामों के लेख मिलते हैं।
  4. न्यायालय और न्यायाधीशों का निरीक्षण सामाजिक न्याय को सुनिश्चित करने के लिए किया जाता था।

📜 साहित्य एवं संस्कृति:

  1. सम्राट के गौरव ओर ऐश्वर्य का प्रदर्शन उनके शासनकाल में हुआ, जिसमें साहित्य और कला का विकास भी शामिल था।
  2. विभिन्न प्रमुख विभागों के कर्मचारियों द्वारा उत्सवों और आयोजनों में समारोह की व्यवस्था की गई।

🚩 अन्य प्रणालियाँ:

  1. न्याय के लिए गाँव और जाति की सभाओं के अलावा निर्णय सामाजिक न्याय द्वारा लिया जाता था।
  2. निर्णय की आधारिक प्रमाण के रूप में मानवीय साक्ष्यों का भी उपयोग किया जाता था।

🏛️ सुसंगठित स्थानीय संस्थाएं:

  1. चोल शासन की एक मुख्य विशेषता थी सुसंगठित नौकरशाही के साथ स्थानीय स्वायत्त संस्थाओं का सहयोग।
  2. ये संस्थाएँ विविध विभिन्न अंगों के लिए कार्य करती थीं और परस्पर सहयोग के माध्यम से समाज को सेवा प्रदान करती थीं।

👥 सामूहिक संस्थाएँ:

  1. नगरों में व्यापारी वर्ग के प्रमुख थे, और उनकी सभाएँ नगरम् के स्थानों पर होती थीं।
  2. गाँवों में ‘सभा ब्रह्मदेय’ नामक ब्राह्मणों की सामूहिक संस्था थी, जो भूमि के मालिक थे।

⚖️ स्वतंत्रता और संगठन:

  1. इन सभाओं को राज्य की ओर से पूर्ण स्वतंत्रता थी, और वे स्वतंत्र रूप से कार्य करती थीं।
  2. संगठित और विकसित समितियों की व्यवस्था थी, जिन्हें ‘वारियम्’ कहा जाता था, जो कार्यों के संचालन के लिए उत्तम था।

📜 सभाओं का विकास:

  1. उत्तरमेरूर की सभा ने अपने संविधान में कई परिवर्तन किए, जो उनकी कुशलतावली का प्रमाण है।
  2. इन सभाओं के कर्तव्यों का क्षेत्र व्यापक और विस्तृत था, और वे समाज के विभिन्न पहलुओं को संबोधित करती थीं।

🌊 सिंचाई की व्यवस्था:

  1. चोल नरेशों ने सिंचाई की सुविधा के लिए कुएँ और तालाब खुदवाए तथा नदियों के प्रवाह को रोककर जलाशय (डैम) बनवाए।
  2. करिकाल चोल ने कावेरी नदी पर बाँध बनवाया और राजेंद्र प्रथम ने गंगैकोंड-चोलपुरम् के समीप एक झील खुदवाई।

🛡️ जल प्रणालियाँ:

  1. राजेंद्र प्रथम द्वारा खुदवाई गई झील के बाँध की लंबाई 16 मील थी और इसको दो नदियों के जल से भरने की व्यवस्था की गई।
  2. सिंचाई के लिए पत्थर की प्रणालियों और नहरों की निर्मिति की गई ताकि खेतों को पर्याप्त जल पहुंच सके।

🛣️ आवागमन की सुविधा:

  1. सिंचाई के लिए प्रशस्त राजपथ और नदियों पर घाट निर्मित हुए ताकि लोग सुबह-सुबह सिंचाई के लिए आसानी से जल प्राप्त कर सकें।

👥 सामाजिक अधिकार:

  1. ब्राह्मणों को सामाजिक अधिकार प्राप्त थे, लेकिन विभिन्न वर्गों के परस्पर संबंध कटु नहीं थे।
  2. धर्मशास्त्रों के आदेशों और आदर्शों के अनुकूल रखकर सामाजिक व्यवस्था को स्थापित किया जाता था।

🏘️ बस्तियाँ:

  1. ब्राह्मणों ने अपने लिए अलग बस्तियाँ बसाईं, लेकिन यह परस्पर संबंधों को प्रतिबंधित नहीं करतीं।

💼 व्यवसायिक वर्ग:

  1. उद्योग और व्यवसाय में लगे सामाजिक वर्ग वलंगै और इडंगै में विभाजित थे।

👩‍👩‍👦 स्त्रियों का स्थान:

  1. स्त्रियों के लिए सामाजिक जीवन में किसी भी प्रकार का प्रतिबंध नहीं था। वे संपत्ति की स्वामिनी थीं।

👨‍👨‍👧‍👧 विवाह और सम्प्रदाय:

  1. उच्च वर्ग के पुरुष बहुविवाह करते थे और सती प्रथा प्रचलित थी।

🙏 धार्मिक प्रथाएँ:

  1. मंदिरों में गुणशीला देवदासियाँ रहती थीं और समाज में दासप्रथा प्रचलित थी।

🌾 कृषि और पशुपालन:

  1. आर्थिक जीवन का आधार कृषि पर था।
  2. भूमिका स्वामित्व समाज में सम्मान का माध्यम था।
  3. पशुपालन का व्यवसाय भी समृद्ध था।

🔨 कला और व्यवसाय:

  1. स्वर्णकार, धातुकार, और जुलाहों की कला उन्नत दशा में थी।
  2. व्यापारियों की अनेक श्रेणियाँ थीं जो विस्तृत क्षेत्र में कार्य करती थीं।

💼 व्यापारिक श्रेणियाँ:

  1. नानादेश-तिशैयायिरत्तु ऐज्जूरुंवर व्यापारियों की एक विशाल श्रेणी थी।
  2. इस श्रेणी के व्यापारी वर्मा और सुमात्रा तक व्यापार करते थे।

🕉️ धर्मीय सहिष्णुता और उपासकों का समर्थन:

  1. चोल सम्राट (Chola Empire चोल साम्राज्य) शिव के उपासक थे और धार्मिक सहिष्णुता की नीति अपनाई।
  2. उन्होंने बौद्धों को भी दान दिया और जैन धर्म के प्रचार में समर्थन किया।

🏛️ मंदिरों का महत्व:

  1. मंदिरों का विशेष महत्व था और इन्हें शिक्षा के केंद्र भी माना जाता था।
  2. त्योहारों और उत्सवों में मंदिरों में गान, नृत्य, और मनोरंजन का आयोजन होता था।

🛕 धार्मिक संगठन:

  1. राजराज प्रथम के काल में शैव धर्मग्रंथों का संकलन किया गया।
  2. वैष्णव आचार्यों ने भक्ति मार्ग को प्रस्तुत किया और मंदिरों की पूजा-विधि में सुधार किया।

🙏 धार्मिक प्रथाओं में परिवर्तन:

  1. शैवों के अतिरिक्त, बीभत्स आचारों वाले कुछ संप्रदाय भी थे, जो प्रायः विकृत रूप ले लेते थे।
  2. देवी के उपासकों में अपना सिर काटकर चढ़ाने की भी प्रथा थी।

🏛️ मंदिरों की विशेषताएं:

  1. चोल मंदिरों (Chola Empire चोल साम्राज्य) की विशेषता उनके विमानों और प्रांगणों में दिखलाई पड़ती है।
  2. मंदिरों के शिखरस्तंभ छोटे होते हैं, लेकिन गोपुरम् पर अत्यधिक अलंकरण होता है।

🕍 प्रारंभिक और प्रभावशाली मंदिर:

  1. प्रारंभिक चोल मंदिर साधारण योजना की कृतियाँ हैं, लेकिन साम्राज्य की शक्ति और साधनों की वृद्धि के साथ मंदिरों के आकार और प्रभाव में भी परिवर्तन हुआ।

🌟 प्रसिद्ध मंदिर:

  1. राजराजेश्वर मंदिर (तंजोर) और गंगैकोंडचोलेश्वर मंदिर (गंगैकोंडचोलपुरम्) चोल युग के प्रसिद्ध और प्रभावोत्पादक मंदिर हैं।

🎨 कांस्य प्रतिमाएँ:

  1. चोल युग (Chola Empire चोल साम्राज्य) अपनी कांस्य प्रतिमाओं की सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है।
  2. नटराज की मूर्तियाँ इनमें सर्वात्कृष्ट हैं, और इसके अतिरिक्त अन्य देवताओं की भी मूर्तियाँ प्रस्तुत हैं।

📜 तमिल साहित्य के इतिहास में चोल शासनकाल (Chola Empire चोल साम्राज्य) :

  1. ‘स्वर्ण युग’ के रूप में प्रस्तुति: चोल शासनकाल को ‘स्वर्ण युग’ की संज्ञा दी जाती है।
  2. प्रबंध साहित्यरचना: प्रबंध साहित्यरचना का प्रमुख रूप था।
  3. धार्मिक सिद्धांतों का विवेचन: शैव सिद्धांतों के शास्त्रीय विवेचन का आरंभ हुआ।
  4. वैष्णव भक्ति-साहित्य और टीकाएँ: वैष्णव भक्ति-साहित्य और टीकाओं की भी रचना हुई।
  5. उल्लेखनीय रचनाएँ:
    • शेक्किलार का ‘तिरुत्तोंडर् पुराणम्’ और ‘पेरियपुराणम्’।
    • रामानुजनूर्रदादि द्वारा सौ पदों की रचना।
    • तिरुत्तक्कदेवर् द्वारा ‘जीवकचिंतामणि’ की रचना।
    • कंबन् द्वारा ‘तमिल रामायणम्’ या ‘रामावतारम्’ की रचना।
  6. अन्य ग्रंथकार:
    • अमितसागर द्वारा ‘याप्परुंगलम्’ और ‘कारिगै’।
    • बुद्धमित्र द्वारा ‘वीरशोलियम्’।
    • दंडियलंगारम् के ‘दंडिन के काव्यादर्श’ पर आधारित ‘दंडियलंगारम्’।
  7. व्याकरण ग्रंथ:
    • गुणवीर पंडित के ‘नेमिनादम्’ और ‘वच्चणंदिमालै’।
    • पवणंदि के ‘नन्नूल’ और ऐयनारिदनार के ‘पुरप्पोरलवेण्बामालै’।
  8. कोश रचना: पिंगलम् का ‘पिंगलम् नाम का कोश’ इसी काल की कृति है।

📜 चोलवंश (Chola Empire चोल साम्राज्य) के शैक्षिक योगदान:

  1. संस्कृत साहित्य और भाषा के लिए विद्यालय स्थापित: चोल नरेशों ने संस्कृत साहित्य और भाषा के अध्ययन के लिए विद्यालय (ब्रह्मपुरी, घटिका) स्थापित किए।
  2. व्यवस्थित दान: चोल नरेशों ने संस्कृत साहित्य की व्यवस्था के लिए समुचित दान भी किया।
  3. शासनकाल का सृजनात्मक महत्व: चोलों के शासनकाल में संस्कृत साहित्य में सृजन की दृष्टि से अत्यल्प महत्व है।
  4. संस्कृत में रचनाएँ:
    • वेंकट माधव द्वारा ‘परांतक प्रथम’ के राज्यकाल में ‘ऋग्वेद पर प्रसिद्ध भाष्य’ का रचना।
    • केशवस्वामिन् ने ‘नानार्थार्णवसंक्षेप’ नामक कोश को राजराज द्वितीय की आज्ञा पर बनाया।
  5. तमिल और संस्कृत अभिलेखों का अंतर: चोलवंश के कुछ संस्कृत अभिलेख, जो विद्यालयों और संस्कृत साहित्य के समर्थन के लिए निर्मित हुए, तमिल अभिलेखों से नीचे हैं।

🌟 चोल नरेशों का संस्कृत साहित्य में योगदान उनके शैक्षिक प्रयासों के माध्यम से विशेष रूप से महत्वपूर्ण था।

 

👑 मध्यकालीन चोल राजवंश के शासकों (Chola Empire चोल साम्राज्य) की सूची और वंशावली:

  1. विजयालय:
    • विजयालय (850-871 CE)
  2. आदित्य चोल:
    • आदित्य चोल (871-907 CE)
    • परान्तक चोल (907-953 CE)
  3. परंबरनार चोल:
    • परंबरनार चोल (953-972 CE)
  4. राजराज चोल:
    • राजराज चोल (985-1014 CE)
  5. राजेन्द्र चोल:
    • राजेन्द्र चोल (1014-1044 CE)
  6. राजदेव चोल:
    • राजदेव चोल (1044-1052 CE)
  7. राजेन्द्र चोल द्वितीय:
    • राजेन्द्र चोल द्वितीय (1052-1063 CE)
  8. वीर राजेन्द्र चोल:
    • वीर राजेन्द्र चोल (1063-1070 CE)
  9. आदिराजेन्द्र चोल:
    • आदिराजेन्द्र चोल (1070-1075 CE)
  10. कुलोत्तुंग चोल:
  • कुलोत्तुंग चोल (1070-1122 CE)

11. विक्रम  चोल:

  • विक्रम चोल (1122 – 1135 CE)
  1. वीर चोल:
    • वीर चोल (1075-1118 CE)
  2. अथिराजेन्द्र चोल:
    • अथिराजेन्द्र चोल (1146-1173 CE)
  3. कुलोत्तुंग चोल द्वितीय:
    • कुलोत्तुंग चोल द्वितीय (1178-1218 CE)

🌟 यह थी मध्यकालीन चोल राजवंश के प्रमुख शासकों की सूची और उनकी वंशावली।

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